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01 दिसंबर, 2009

मुफ्त के 'निरोध' से बना रहे माल

रीपैकेजिंग कर हो रही है धड़ल्ले से बिक्री
सरकार द्वारा नि:शुल्क बाँटने के लिए पेश किए जाने ाले 'निरोध' कंडोम को ई पैकेजिंग से विदेशी देश में ब्रांडों के नाम से बेचा जा रहा है।

हिंदुस्तान लेटेक्स लिमिटेड के कारखानों में निरोध का उत्पादन मुख्यत: नि:शुल्क बाँटने के लिए होता है, ताकि अनचाहे गर्भ और एचआईवी एड्ए रोग के संक्रमण के खतरे से बचा जा सके।

लेकिन खोजबीन से पता चला है कि कारखानों से निकलते ही निरोध की खेप को निजी लेटेक्स कारखानों में पहुँचा दिया जाता है। जहाँ इन्हें चमकदार व कामुक दिखने वाले कवरों में डाल कर नए ब्रांड नाम के साथ जयपुर, इंदौर, राँची तथा दूरदराज के अन्य बाजारों में भेजा जाता है।

दिल्ली में सोशल मार्केटिंग आर्गेनाइजेशन (एसएमओ) के अध्यक्ष ने प्रयोग कर के बताया कि निरोध की पुन: पैकेजिंग कैसे की जाती है। अपने अँगूठे के सहारे उन्होंने सीलबंद निरोध पट्टी को खोला और बिना छुए कंडोम लुब्रिकेंट की सहायता से इसे नई पैक में डाल दिया।

उन्होंने कहा कारखानों में प्रशिक्षित लोग होते हैं और जिन कारखानों में मशीनों का इस्तेमाल होता है, एक दिन में लगभग एक लाख निरोध की रीपैकेजिंग की जा सकती है।

जयपुर में एक दुकान पर राकेश राठौड़ (परिवर्तित नाम) ने स्वीट वार ब्रांड नाम वाले एक कंडोम को खोलकर दिखाया कि उसके रिम के पास एचएलएल कोड एच9एफ अंकित था। इसका मतलब है कि यह कंडोम हिंदुस्तान लेटेक्स में 2009 में बना है और नि:शुल्क (फ्री) आवंटन के लिए है।

दुकानदार ने बताया कि उनके पास इसके कई और कार्टन हैं। तीन कंडोम के पैक के 15 रुपए वसूले जाते हैं। उल्लेखनीय है कि कंडोम पर कोडिंग की प्रणाली 2006 में शुरू हुई, जबकि इससे पहले तो रोक और पकड़ का कोई तरीका ही नहीं था।

वर्ष 2006 में पुलिस ने महाराष्ट्र के एक कारखाने पर छापा मारा और नि:शुल्क आवंटन के लिए बने 20 लाख रुपए मूल्य के निरोध कंडोम जब्त किए। इससे निरोध को रीपैकेजिंग के जरिए की जा रही कमाई का घपला सामने आया।

तत्कालीन स्वास्थ्य सचिव नरेश दयाल ने इस तरह की घपले के अब भी जारी रहने पर हैरानी जताई है। उनके कार्याकाल में ही कोडिंग प्रणाली शुरू हुई थी। उन्होंने कहा कोडिंग प्रणाली के कार्यान्वयन से हमें लगा कि इस धंधे पर रोक लगेगी लेकिन मुझे हैरानी है कि यह अब भी चल रहा है।

पुलिस तथा जाँच एजेंसियों ने इस तरह के कारोबार के खिलाफ अभियान चलाया तो इसका सबसे अधिक असर राष्ट्रीय राजधानी के प्रमुख बाजारों में दिखा। कभी रीपैकेज्ड कंडोम का मुख्य बाजार रहे भागीरथ पैलेस व सदर बाजार जैसे बाजारों में अब ऐसा नहीं होगा।

यह कारोबार देश के दूसरे दूरदराज के बाजारों में स्थानांतरित हो गया है। भागीरथ पैलेस के एक व्यापारी ने कहा इन कंडोम को रखना जोखिमभरा हो गया है। अब हम केवल वही कंडोम बेचते हैं, जिन पर विनिर्माता का नाम व पता हो।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में संयुक्त सचिव बीके प्रसाद ने कहा मैंने हाल ही में कार्यभार संभाला है और पहले जो उसके बारे में कुछ नहीं कह सकता। लेकिन अगर कुछ लोग सरकारी आपूर्ति में घपला कर रहे हैं तो इसकी जाँच होना चाहिए।

एचएलएल के अध्यक्ष एम. अय्यपन ने निरोध के साथ घपले की बात स्वीकारी, लेकिन दावा किया कि एचएलएल के स्तर पर कोई कमी नहीं है। उन्होंने कहा कि कंपनी को अधिसूचित केंद्रों को स्टाक की आपूर्ति पर ही पैसा मिलता है।

दिल्ली में एक एसएमओ इससे सहमत नहीं हैं। उन्होंने कहा कि उत्तरप्रदेश में ही हमारे अनुमान के अनुसार तीन करोड़ कंडोम की हर साल चोरी होती है। इस तरह का घपला एचएलएल से किसी की मिलीभगत के बिना नहीं हो सकता। एचएलएल के अध्यक्ष ने बात करने पर बार-बार जोर दिया कि उनका कोई आदमी इसमें शामिल नहीं है।

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