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12 अक्तूबर, 2009

लुप्त हो रहा है कंसार व्यवसाय

राजेश कानोडिया (नवगछिया)
लगभग एक दशक पूर्व तक चल रहे कंसार व्यवसाय का अब नामोनिशान नहीं रहा। इस व्यवसाय के तहत कमजोर वर्ग की महिलाएं अपने कंसार (भूजा भूजने का स्थल) में मकई, चना, चूड़ा, मूढ़ी, चावल आदि भूजने का काम करती थी। जिसके पारिश्रमिक स्वरूप उन्हें कुछ पैसे और अनाज मिला जाया करते थे जिससे उनका परिवार चलता था। पर अब ऐसा नहीं है। कंसार को कोसी संस्कृति में सांझा चूल्हा भी कहा जाता था, जहां उसकी अपनी अलग पहचान और गरिमा थी। जहां गांव एवं क्षेत्र की नयी दुल्हन से लेकर दादी मां तक आपस में दिल की बातें कर लिया करतीं थीं। पर इन दिनों कंसार और कंसारिन दोनों ही समाप्त हो चुके हैं। अब भूजा भूजने की जरूरत पड़ती है तो खपड़ी की जगह घरेलू कड़ाही में ही अपने घर में भूजना पड़ता है।

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