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27 फ़रवरी, 2010

नानाजी देशमुख नहीं रहे

Nanaji Deshmukh
प्रबुद्ध समाजसेवी और विचारक नानाजी देशमुख का शनिवार की शाम यहाँ से 80 किलोमीटर दूर सेवासंघ अस्पताल में निधन हो गया। वह 95 वर्ष के थे।

नानाजी देशमुख लंबे समय तक जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे, लेकिन साढ़े चार दशक पूर्व उन्होंने खुद को राजनीति से अलग कर लिया और आदर्श समाज के निर्माण का बीड़ा उठाया।

कुछ समय से बीमार चल रहे नानाजी को आज सुबह सीने में दर्द की शिकायत के बाद अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उन्होंने अंतिम साँस ली।

महाराष्ट्र में जन्मे और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के जीवनव्रती प्रचारक नानाजी का जन्म महाराष्ट्र में हुआ था और वे राज्य सभा के सदस्य रह चुके थे।

आजीवन समाज सेवा का व्रत ले चुके नानाजी ने दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना करके उत्तरप्रदेश-मध्यप्रदेश सीमा के दोनो तरफ के क्षेत्रों में शिक्षा स्वास्थ्य और लोगों को आर्थिक दृष्टि से आत्म निर्भर बनाने के लिए सराहनीय काम किया और 1999 में उन्हें 'पद्म विभूषण' से सम्मानित किया गया।

उन्होंने मप्र और उप्र के 500 सीमावर्ती गाँवों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार और लोगों को आर्थिक रूप से आत्म निर्भर बनाने के लिए उल्लेखनीय काम किया।

नानाजी आरएसएस से जनसंघ में गए थे। उन्होंने 60 साल की उम्र पूरी होते ही राजनीति छोड़ दी थी क्योंकि उनका मानना था कि 60 साल की उम्र के बाद व्यक्ति को राजनीति छोड़ देनी चाहिए। इसके बाद वह नई ऊर्जा के साथ रचनात्मक कार्य में लग गए।

इस बीच प्रदेश भाजपा अध्यक्ष डॉ. रमापति राम त्रिपाठी एवं अन्य भाजपा नेताओं ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है और कहा है कि उनकी नि:स्वार्थ समाज सेवा मौजूदा एवं आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरणा देती रहेगी। नानाजी देशमुख को लोकनायक जयप्रकाश नारायण और इंडियन एक्सप्रेस के रामनाथ गोयनका के बहुत करीबी माना जाता था।

वह राजनीति में अटलबिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी जैसे भाजपा के नेताओं से वरिष्ठ थे और भाजपा के गठन के काफी पहले राजनीति को अलविदा कह चुके थे।

नानाजी ने अपने जीवनकाल में दीनदयाल शोध संस्थान, ग्रामोदय विश्वविद्यालय और बालजगत जैसे सामाजिक संगठनों की स्थापना की। उन्होंने उत्तरप्रदेश के गोंडा जिले में भी उल्लेखनीय सामाजिक कार्य किया था।

चित्रकूट स्थित दीन दयाल शोध संस्थान में पधारे पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने नानाजी देशमुख द्वारा कमजोर वर्ग के उत्थान में उठाए गए कदमों की सराहना की और इस क्षेत्र में उनकी उपलब्धियों को अनुकरणीय बताया था। नानाजी उस वक्त विवाद के घेरे में आ गए, जब 1984 में उन्होंने कहा था कि अब समय आ गया है कि संघ राजीव गाँधी के साथ खड़ा रहे।

नानाजी अटल बिहारी वाजपेयी समेत सभी भाजपा के बड़े नेताओं के पथप्रदर्शक रहे। उन्होंने सादगी और ईमानदारी की मिसाल पेश की। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सबसे वृद्ध प्रचारक नानाजी की दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में कितनी आस्था दृढ़ थी, इसकी मिसाल 2000 में उस वक्त देखने को मिली जब वे व्हीलचेयर पर बैठकर मतदान करने पहुँचे।

नानाजी की भारतीय लोकतंत्र में गहरी आस्था थी और वे कहते थे कि देश के हर नागरिक को मतदान का उपयोग करके अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। यही कारण था कि चलने-फिरने में लाचार होने के बावजूद उन्होंने मतदान में हिस्सा लिया था।

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