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26 जनवरी, 2010

कैसे भूल सकता हूं पहला गणतंत्र

आजादी का नाम सुनते ही रोमांचित हो जाते हैं बैजनाथ जालान। पहला गणतंत्र 26 जनवरी 1950, कैसे भूल सकता हूं, घर-घर में उत्साह। हरनाम पंजाबी आगे-आगे और उनके पीछे हुजूम। तिरंगा लहराना था, तय हुआ पहाड़ी मंदिर से उपयुक्त स्थल क्या होगा। उन दिनों सीढि़यां तो थी नहीं, पर्वतोरोही की तरह चढ़ गए ऊपर। दुर्भाग्य से तिरंगा डोर में उलझ गया। यह देख हरनाम विचलित हो गए। लाख समझाने पर कि वे गिर जाएंगे, बिना देर किए बांस पर चढ़ गए, फिर तिरंगा लहरा उठा।

अब वह बात कहां, किसे फिक्र है तिरंगे की। शाम हुई तो घर-घर में दीप जले थे, मिठाइयां बंटी थी, अब तो औपचारिकता भर ही रह गई है। 97 वर्ष के हो चुके बैजनाथ जालान, एक ही सांस में यह सब कह जाते हैं। ओसीसी कंपाउंड में रहने वाले जालान के जेहन में आजादी का रंग आज भी ताजा है। गणतंत्र का तिरंगा लहराने को वे बेताब हैं।

कहते हैं मंगलवार की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं, चूंकि उम्र अधिक है, सो घर में ही उत्सव होगा। बेटे-पोते-पोतियां, नाती, नातिन सभी उनकी खुशियों में शरीक होंगे।

तिरंगा लेकर दौड़ पड़े थे हम

पहला गणतंत्र की याद ही ऐसी है जो भुलाए नहीं भूलती। ऐसा लगा मानों हम सचमुच खुली हवा में सांस ले रहे हों। पहले गणतंत्र की याद में डूबे 75 वर्षीय कन्हैया लाल जालान बताते हैं कि तब हम युवा थे। मारवाड़ी कालेज में पढ़ते थे। पर आजादी के मायने हमें पता थे। रांची में तब ज्यादा आबादी नहीं थी, पर जितनी भी थी जश्न में डूबी थी। जगह-जगह जुलूस निकाले जा रहे थे, हम भी जहां जुलूस निकलता वहां तिरंगा हाथ में उठाए शामिल हो जाते।

बकरी बाजार में सामूहिक रूप से झंडा फहराया गया था, बहुत भीड़ जमा थी, याद आज भी ताजा है। हालांकि तब में और आज में बहुत फर्क आ गया है, खासकर युवा वर्ग तो जनता ही नहीं कि हमें कितनी मुश्किलों से आजादी मिली थी।

तब ढोल-नगाड़े के साथ निकले थे

26 जनवरी 1950 का वह दृश्य उनके जेहन में अब भी विद्यमान है। तब ढोल, नगाड़े, मांदड़ व हारमोनियम के साथ निकले थे हम। तादाद सैकड़ों की, सबके हाथ में तिरंगा। नहा-धोकर साफ कपड़े पहनकर 30-40 गांवों के ग्रामीण एक जगह एकत्रित हुए थे। उन्हें याद है वर्तमान कार्डिनल तेलस्फोर पी टेाप्पो भी इस आयोजन के तब गवाह बने थे। 82 वर्षीय विनित फ्रांसिस मिंज 42 वर्षो तक शिक्षक की सेवा देने के बाद 1998 में रिटायर हुए हैं।

कहते हैं देश प्रेम की ललक तो उन दिनों देखने को मिलती थी, आज कहां है वह जज्बा।

तिरंगे की थी शान निराली

उन दिनों हम सेना में थे। जल्द जाग गए थे। सुबह में विशेष परेड का आयोजन और शाम में बड़ा खाना। सेना के निचले दर्जे के कर्मचारी से लेकर बड़े अधिकारी तक, सब एक मेज पर। तब हम आस-पड़ोस में भी देश प्रेम जाग्रत करने का काम किया करते थे। चाहे वह समाज के किसी वर्ग का हो, देश प्रेम की भावना कमोबेश हर शख्स में थी। तिरंगे आज भी लहरा रहे हैं, पर उस पर अभिमान करने वालों की संख्या घटती जा रही है।

92 वर्षीय लाल भोलानाथ शाहदेव जंग-ए-आजादी की दास्तां सुनाते-सुनाते भाव विभोर हो जाते हैं।

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