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25 जनवरी, 2010

राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल का राष्ट्र के नाम संदेश

राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने अनाज की घटती उपलब्धता और उनके बढ़ते दामों पर चिंता जताते हुए दूसरी हरित क्रांति की दिशा में तुरंत कदम उठाने की जरूरत बताई।
गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने कहा कि हमारे देश की तरह पूरे विश्व में खाद्यान्न की माँग बढ़ रही है। यह स्थिति हमें आगाह करती है कि हमें कृषि उत्पादकता बढ़ाने पर गहराई से ध्यान देना होगा, जिससे कि खाद्यान्नों की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके, विशेषकर उन कृषि उत्पादों की, जिनकी आपूर्ति कम है ताकि बढ़ती हुई कीमतों से बचा जा सके।
उन्होंने कहा कि इस महत्वपूर्ण उद्देश्य को पूरा करने के लिए मैं दूसरी हरित क्रांति की दिशा में तुरंत कदम उठाने पर जोर देना चाहूँगी। इसके लिए नई तकनीकों, बेहतर बीजों, उन्नत कृषि तरीकों, प्रभावी जल प्रबंधन तकनीकों और अधिक मजबूत ढाँचों की आवश्यकता है, जो किसानों को वैज्ञानिक समुदाय, ऋण देने वाली संस्थाओं तथा बाजार से जोड़ें।
राष्ट्रपति ने भारत के विशाल भू-भाग और जनसंख्या के अनुपात में देश के मौजूदा बुनियादी ढाँचे को भी अपर्याप्त बताया। उन्होंने कहा कि एक ऐसा देश जो भौगोलिक रूप से सातवाँ तथा जनसंख्या की दृष्टि से दूसरा सबसे बड़ा देश है, उसके लिए हमारा मौजूदा बुनियादी ढाँचा अपर्याप्त है। इससे संपर्क बाधित और अवरुद्ध होता है। हमें इस स्थिति को बदलना होगा। पुलों, सड़कों, बंदरगाहों तथा हमारी बिजली उत्पादन क्षमता, परिवहन सुविधाओं आदि को व्यापक स्तर पर बढ़ाना होगा।
देश में नई सुरक्षा नीति बनाने की चर्चा के बीच राष्ट्रपति ने कहा कि सरकार आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों से निपटने के लिए अत्यधिक चौकसी बरतने और उपयुक्त कदम उठाने के लिए प्रतिबद्ध है।
विकास के लिए सुरक्षापूर्ण माहौल को जरूरी बताते हुए उन्होंने कहा कि हमारा देश दो दशक से ज्यादा से आतंकवाद का निशाना रहा है। सरकार ने आतंकवाद से पैदा होने वाले खतरों से निपटने के लिए आवश्यक सुरक्षा उपाय किए हैं और करती रहेगी। वह इस संकट का मुकाबला करने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ भी कार्य करेगी।
देश में विभिन्न योजनाओं के लिए आवंटित विशाल धन राशि के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं आने पर खिन्नता जताते हुए पाटिल ने कहा कि इसके पीछे सबसे बड़ी बाधा और समस्या कमजोर कार्यान्वयन और व्यवस्था में भ्रष्टाचार का होना है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि शिथिल कार्यान्वयन की इस पुरानी बीमारी के कारणों का उपचार करना होगा। परियोजनाओं, कार्यक्रमों और योजनाओं के कार्यान्वयन की कमियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। सकरात्मक बदलाव के लिए ऐसा करना जरूरी है। संप्रग सरकार के समावेशी विकास के लक्ष्य के बारे में उन्होंने कहा कि इसके लिए सामाजिक न्याय जरूरी है। इसे प्रभावी सामाजिक क्षेत्र के बुनियाद ढाँचे के जरिये प्रदान किया जा सकता है। सामाजिक सेवाओं और रोजगार के अवसरों के साथ-साथ सभी नागरिकों को उत्तम शिक्षा और बेहतर सेवाएँ उपलब्ध करवानी होंगी ।
धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर हमेशा अडिग रहने के संदर्भ में उन्होंने कहा कि हमारे संविधान में धर्मनिरपेक्षता का जो मार्ग चुना गया है, हमारे राष्ट्रीय जीवन में इसके स्थान को कभी नहीं बदला जा सकता है। हमें सामाजिक समरसता को बनाए रखना है। हमारी मिलजुल कर रहने की पंरपरा जारी रहनी चाहिए, ताकि यह हमारी भावी पीढ़ियों के जीवन प्रवाह का एक अभिन्न हिस्सा बन सके।
इक्कीसवीं शताब्दी के पहले दशक के दौरान भारत में आमूलचूल परिवर्तन आने का जिक्र करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि न सिर्फ भारत में बड़े बदलाव आए हैं बल्कि यह खुद भी विश्व में बदलाव लाने वाली शक्ति के रूप में उभरा है। राष्ट्र एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच गया है। यहाँ से हम दृढ़ विश्वास और निष्ठा के साथ मिलकर काम करेंगे तो एक विकसित और प्रगतिशील राष्ट्र के अपेक्षित उज्जवल भविष्य का दावा कर सकते हैं।
साथ ही उन्होंने सचेत किया कि अपनी कमियों को दूर करने और अपने गुणों को एक ऊर्जावान शक्ति में बदलने के दौरान हमें पूरी तरह जागरूक होना चाहिए कि हमें क्या सहेजकर रखना है और क्या बदलना है। उन्होंने कहा कि सबसे पहले हमें अपने लोकतांत्रिक मूल्यों और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों को सँजोकर रखना होगा।
राष्ट्रपति ने कहा कि हमें अलग-अलग विचारों का सम्मान करना होगा और मतभेदों पर सकारात्मक और मैत्रीपूर्ण ढंग से ध्यान देना होगा। ये एक ऐसे समाज की नींव है, जो एक समग्र इकाई के निर्माण के लिए विभिन्न भाषाओं, धर्मों और संस्कृतियों को अपना लेता है। हमारे जैसे विशाल और विविधतापूर्ण राष्ट्र को इन मूल्यों का निरंतर पालन करना चाहिए।

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