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20 दिसंबर, 2009

रेलगाड़ी की शक्ल में बैलगाड़ी

अगर बचपन में बैलगाड़ी पर चढ़ने का अवसर नहीं मिला हो तो उदास न हों। इसका दूसरा विकल्प पूर्व मध्य रेल के बरौनी-कटिहार रेलखंड पर मौजूद है। यहां रेलगाड़ी की शक्ल में बैलगाड़ी का मजा नवगछिया से खगडि़या तक के सफर में आपको मिल जाएगा। हां, 80 किलोमीटर की यात्रा के लिए आपको अपना कीमती चार घंटा या इससे भी अधिक का समय जरूर जाया करना होगा। ऐसा एसलिए कि इस रेलखंड में माल गाडि़यों को तरजीह दी जाती है। अगर आप जल्दी में आकर किसी एक्सप्रेस ट्रेन में सवार हो गये और संयोगवश कोई मालगाड़ी उससे आगे खुल गयी तो समझें कि आपकी भद पीट गयी। क्योंकि आपकी एक्सप्रेस गाड़ी यहां-वहां मालगाड़ी के पीछे-पीछे बैलगाड़ी की चाल में चलेगी। जी हां, किराया एक्सप्रेस का हो या स्लीपर के साथ वातानुकूलित का। पर सफर का मजा बैलगाड़ी का ही मिलेगा। इस बारे में पूछने पर रेल अधिकारी कहते हैं कि कुहासे के कारण सिग्नल नहीं दिखता। इसलिए कभी बाकी-टाकी तो कभी पटाखा से काम चलता है। इस कारण गाडियां विलंब से चल रही है। जबकि वास्तविकता कुछ और है। बरौनी-कटिहार के बीच बरौनी से तिलरथ, खगडि़या से गौछारी, नारायणपुर से बरौनी, नवगछिया से कटरिया एवं काढ़ागोला से कटिहार स्टेशन तक ही डबल रेल लाइन चालू हो सकी है। स्टेशनों के बीच अभी भी सिंगल लाइन पर ही गाडि़यों का परिचालन हो रहा है। इस कारण परिचालन बाािधत हो रही है। वहीं एक ही समय में कई ट्रेनों के एक साथ आगे-पीछे परिचालन से भी विलम्ब होती हैं। बता दें कि खगडि़या से नवगछिया की ओर सुबह में लगातार कई गाडि़यां हैं। जबकि दोपहर, शाम और रात में गिनी-चुनी ही गाडि़यां है। कमोवेश यही हाल नवगछिया से खगडि़या की ओर खुलने वाली ट्रेनों के समय का है, जिसकी पीठ पर कभी राजधानी तो कभी सीमांचल एक्सप्रेस हमला बोल आगे निकलती चली जाती है। फिर इनके पीछे मालगाड़ी तब एक्सप्रेस और फिर सवारी गाड़ी।

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