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10 सितंबर, 2009

मातृभाषा पर दो खेमा में बंटा नेपाल

नेपाल के उपराष्ट्रपति परमानंद झा के नेपाली में शपथ ग्रहण न करने के कारण समूचा नेपाली समाज दो खेमों में बंट गया है। एक तरफ पहाड़ी मूल के नेपाली हैं, जो नेपाली को मातृभाषा मान रहे हैं, दूसरी तरफ एक तबका ऐसा है जो हिंदी को ही नेपाल की मूल भाषा मान रहा है। इसको लेकर नेपाल में कई स्थानों पर हिंसात्मक झड़पें भी हुई हैं।

नेपाल की राजधानी काठमांडू में हिंदी विरोधी आंदोलनों की झड़ी लगी है, दूसरी तरफ नेपाल के मधेश बहुल्य 20 जिलों में हिंदी के पक्ष में अनेक अभियान चलाये जा रहे हैं। पहाड़ी मूल के नेपालियों का दावा है कि नेपाली ही इस देश भाषा है, जबकि वास्तविकता उलट है। लगभग तीन सौ साल पहले जब पृथ्वीनारायण शाह ने नेपाल अधिराज्य की स्थापना की थी, उसी समय से हिंदी को नेपाल की जननी माना जाता रहा है।

नेपाल के मधेश समर्थक हथियारवादी संगठन तराई कोबरा के इंचार्ज राजगुरू ने 'दैनिक जागरण' से कहा कि नेपाल के जनक पृथ्वीनारायण शाह ही नहीं, उनके बाद के रणबहादुर शाह, उपेंद्र विक्रमशाह ने हिंदी को सर्वोपरि मानते हुए अपने शासन काल में काठमांडू में हिंदी में कई एतिहासिक शिलालेख स्थापित करवाए। राजगुरू के मुताबिक नेपाल के राजमहल नारायणहिती, सहित केलटोन, काठमांडू तथा अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर सारे दोहे और चौपाइयां हिंदी में उत्कीर्ण हैं।

राजगुरू के मुताबिक नेपाल में 1954 में गठित शिक्षा आयोग की रिपोर्ट में हिंदी को नेपाली से बड़ी भाषा माना गया है। उनका कहना है कि हिंदी संस्कृत की कोख से निकली है और नेपाली हिंदी की कोख से।

दरअसल नेपाल में हिंदी विरोध के पीछे मुख्य कारण मधेशियों का विरोध है। माओवादी इस मुद्दे को तूल देकर पहाड़ी मूल के नेपालियों में अपनी पकड़ मजबूत बनाने के प्रयास में हैं, मगर अब मधेशी इस रणनीति को समझ गये हैं और वह हिंदी को नेपाल की एक अन्य राजभाषा बनाए जाने से कम पर तैयार नहीं है। कोबरा इंचार्ज राजगुरू का कहना है कि अब नेपाल में अलख जग चुकी है। यदि मधेशियों पर नेपाली थोपी गई तो नेपाल को अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा।

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