01 सितंबर, 2009
विश्वविद्यालय शिक्षकों की गैर हाजिरी पर लगाम
बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था में सुधार की नई कड़ी जोड़ते हुए सरकार ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नियमानुसार सभी विश्वविद्यालयों में शिक्षकों-अधिकारियों की उपस्थिति 01 सितंबर 09 से सुनिश्चित करने की व्यवस्था कर ली है। कल मंगलवार से विश्वविद्यालयों को प्रतिदिन सायं 5।30 तक अपने सभी शिक्षकों की उपस्थिति का विवरण मानव संसाधन विभाग को देना होगा। ऐसा विश्वविद्यालय के इतिहास में पहली बार होगा। शिक्षकों, अध्यक्षों और प्राचार्यो में इस निर्देश को लेकर फिलहाल असमंजस की स्थिति है। शिक्षण की गुणवत्ता से जुड़े इस कदम पर छात्र संगठनों की प्रतिक्रिया अभी नहीं मिली है लेकिन पटना विश्वविद्यालय के शिक्षक संगठन पूटा ने इस निर्देश के विरोध की मुद्रा अपना ली है। गत 25 अगस्त 09 को मानव संसाधन विकास विभाग के सचिव केके पाठक ने विश्र्वविद्यालयों को पत्र सं. 34/स.कां. के द्वारा इस आशय का निर्देश जारी किया था। इस निर्देश को पटना विश्वविद्यालय ने पत्रांक बीएसयू 8/2005-1632 जीएस (1) दिनांक 29.6.2005 को जारी अधिनियम की प्रतिलिपि के साथ सभी कालेजों, विभागों, संस्थानों को प्रेषित कर दिया है। यह अधिनियम यूजीसी के दिशा निर्देशों के अनुरूप है, जिसमें अवकाश, दिवस, शिक्षण दिवस एवं शिक्षकों के कार्यभार को निर्धारित किया गया है। 12 सप्ताह अवकाश के लिये, 40 सप्ताह कार्य दिवस के लिये निर्धारित है। 40 सप्ताह में 10 सप्ताह परीक्षा एवं अन्यत्र कार्यो के लिये तथा 30 सप्ताह (180 दिन) केवल अध्यापन के लिये निर्धारित हैं। प्रत्येक शिक्षक के लिये प्रति सप्ताह 40 घंटे एवं न्यूनतम 5 घंटे प्रतिदिन की उपस्थिति अनिवार्य है। हालांकि यह अधिनियम पुराना है, लेकिन विश्र्वविद्यालयों में प्रभावी नहीं रहा है। विभाग का मानना है कि विश्र्वविद्यालयों में पठन-पाठन यूजीसी के तय मानकों के अनुसार नहीं हो रहा है और शिक्षकगण तय समय सारणी का पालन नहीं कर रहे हैं इसलिए नयी व्यवस्था लागू की जा रही है। जाहिर है, इससे उन शिक्षकों-अधिकारियों में हलचल है, जो अधिनियम के क्रियान्वयन में शिथिलता का लाभ उठा कर गैर हाजिर रहते थे। छात्र हित में उठाये गए इस कदम को शिक्षकों ने अपने खिलाफ मानकर हाजिरी पर्ची जमा करने संबंधी निर्देश का विरोध किया है। पूटा महासचिव रणधीर कुमार ने इसे विश्वविद्यालय की स्वायत्तता में अनावश्यक हस्तक्षेप करार दिया है। उन्होंने कहा कि कुलाधिपति से मिलकर वे अपनी आपत्ति दर्ज कराएंगे। पूटा के पूर्व महासचिव प्रो. अमरनाथ सिंह ने कहा कि जिन शिक्षकों को पठन-पाठन से कोई मतलब नहीं है, उन पर ऐसे निर्देशों का वास्तव में कोई प्रभाव ही नहीं पड़ता, बल्कि विश्र्वविद्यालय और सरकार से उन्हें पुरस्कृत ही किया जाता है। प्रो. तरुण कुमार ने कहा कि यदि राज्य में पठन-पाठन और शोध के लिये उपयुक्त वातावरण बनाना है तो सरकार को पहले आधारभूत संरचना बनानी चाहिए। ऐसे निर्देशों की आत्मा का पालन तभी हो सकेगा। पूटा के पूर्व अध्यक्ष और वनस्पति विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर यूके सिन्हा ने कहा कि इसको लागू करने में बहुत सारी व्यावहारिक कठिनाइयां हैं।
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