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25 अक्तूबर, 2010

जीवनदायी नहीं रहा गंगाजल!

लखनऊ ।जीवनदायिनी गंगा जीवन के लिए संकट का कारण बनती जा रही है। गंगा शुद्धि अभियान के कई दशक गुजर जाने के बावजूद गंगा जल को गंगा जल बनाने की कवायद काम नहीं आयी है। इलाहाबाद हाईकोर्ट इस मसले को लेकर तल्ख है, कि आखिर वे बुनियादी काम क्यों नहीं हो रहे हैं, जो पहले से तय हैं और लोगों को पता है कि गंगा के प्रदूषण की मुख्य वजह यही है। बार-बार फटकार के बाद भी सवाल जहां के तहां खड़े हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) को यह जिम्मेदारी सौंपी गयी है कि गंगा के प्रवाह को कैसे शुद्ध करें। हालात का जायजा लिया जाये तो पता चलता है कि कानपुर से लेकर वाराणसी तक गंगा में इतना अपजल प्रवाहित होता है कि गंगा जल जिसके लिए जाना जाता है, वह मूलगुण ही खो देता है। इलाहाबाद शहर को ही लें तो करीब दर्जनभर बड़े नालों का गंदा पानी गंगा में गिर रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार ही गंगा में 230 एमएलडी गंदा पानी गिर रहा है, जबकि इस गंदे पानी को संशोधित करने की क्षमता मात्र 89 एमएलडी ही है। नैनी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में 60 एमएलडी और सलोरी प्लांट में 29 एमएलडी की शोधन क्षमता है। गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त करने में लगी एजेंसियों के दावों के बावजूद मोरी और सलोरी सहित दर्जनों नाले गंगा में जहर उड़ेल रहे हैं, तो ट्रीटमेंट प्लांटों से निकलने वाला पानी भी कम जहरीला नहीं है। इसी प्रकार शहर से लगभग 600 मीट्रिक टन कचरा रोजाना निकल रहा है, जिसे गंगा के तटवर्ती इलाकों (कैचमेंट एरिया) में फेंका जा रहा है। कचरे से निकलने वाले रसायन भी गंगा को प्रदूषित कर रहे हैं। वाराणसी में पहले तक करीब चार सौ मीटर की चौड़ाई में बहने वाली गंगा आज 50 मीटर के दायरे में सिमटी हैं। सीवर जल के अलावा शहर व आसपास के तकरीबन 15 सौ से अधिक कल- कारखानों से निकलने वाला औसतन 95 एमएलडी जहरीला पानी विभिन्न नालों के जरिये गंगा में गिर रहा है। पिछले दिनों हरिश्चंद्रघाट के निकट गिर रहे रसायन युक्त पानी की ओर प्रशासन का ध्यान आकृष्ट कराया गया, तो कहीं जा कर इसपर तो अंकुश लगा, लेकिन अन्य कारखानों से केमिकल युक्त पानी गिरने का सिलसिला जारी है। चिंता इस बात की है कि जलशोधन की जो योजनाएं चल रही हैं अथवा प्रस्तावित हैं, वे मलजल को फिल्टर कर शोधन करने की है। पानी में घुले रसायनों के प्रभाव को समाप्त करने की कोई व्यवस्था नहीं है। लिहाजा निकट भविष्य में गंगा की दशा सुधरने अथवा संचालित व प्रस्तावित योजनाओं से लाभ मिलने की उम्मीद नजर नहीं आती। नगवा नाला, जिसकी कभी असि नदी के रूप में पहचान हुआ करती थी, इसके माध्यम से गंगा में आज भी खुलेआम तकरीबन 70 एमएलडी सीवर का पानी गिर रहा है। इसी तरह वर्ष 2005 से नगर में संचालित रिलीविंग ट्रंक सीवर योजना का लाभ आगामी आठ वर्षो तक न शहर को मिलने वाला है और न ही गंगा को। स्थिति यह है कि प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष गंगा में गिर रहे औसतन 450 एमएलडी पानी (जिसमें जल संस्थान से तकरीबन 280 एमएलडी और घर-घर में लगे समरसेबुल पंपों के जरिए 85 एमएलडी और कल- कारखानों से निकलने वाले 95 एमएलडी पानी) के विपरीत अब तक महज 102 एमएलडी मलजल के शोधन की ही व्यवस्था हो पाई है। आगे जायका व जेएनएनयूआरएम के तहत 496 करोड़ की प्रस्तावित योजना के तहत सथवा में 260 एमएलडी क्षमता वाले ट्रीटमेंट प्लांट की स्थापना, तीन पंपिंग स्टेशन व मेनलाइन का विस्तार किया जाना है। वर्ष 2005 की प्रस्तावित इस योजना को वर्ष 2010 में जा कर शासन से स्वीकृति मिली। अब टेंडर में पेच फंसा है। कार्यदायी संस्था गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई के अधिकारी कहते हैं कि इसे मूर्तरूप लेने में कम से कम छह वर्ष लगेंगे।

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